देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। जो हमारा है, वही सत्य है, और जो हमारा नहीं है, वही असत्य है। जो सत्य स्वीकार करता है, वह संसार से पार जा सकता है। सत्य तो आत्म तत्त्व ही है और सत्य को प्राप्त करने के लिए तप त्याग करना होगा दशलक्षण पर्व के पांचवे दिन उत्तम सत्य धर्म पर उपदेश देते हुए मुनि श्री वैराग्य सागर जी महाराज ने कहा। जिसकी वाणी में सत्यता और मधुरता आती है, उसकी बात सब स्वीकार करते हैं। वचन प्राप्ति की सार्थक सत्य बोलने से ही होती है। हिंसा आदि के कार्य की सलाह देना भी असत्य कहा गया है। सत्य को दबाया नहीं जा सकता है। सत्य की प्राप्ति करना चाहते हो, तो सत्य के स्वरूप को जानो। धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए मुनिश्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि आज का व्यक्ति, सत्य को वास्तविकता को स्वीकार नहीं करना चाहता है। सत्य को छिपाने के लिए नाना प्रकार का उपाय कर करते हैं और असत्य को प्रकाशित करने के लिए प्रदर्शन विज्ञापन करता है। व्यक्ति लोभ, भय, हास्य और स्नेह के कारण असत्य बोलता है। एक असत्य को दिवाने या सत्य रूप में सिद्ध करने के लिए हजार असत्य को गढ़ता है। सत्य को स्वीकारने वाला निर्भय और निर्विकल्प रहता है। जो दिख रहा है, वह सत्य नहीं है और जो नहीं दिख रहा है, वही सत्य है।




