देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। एक साधक अपने जीवन का अन्त भी महोत्सवापूर्वक करता है। दिगम्बर जैन-भ्रमण परम्परा को पुनाजीवित करने वाले आचार्य श्री शान्ति सागर जी महामुनिराज ने आज अपने संयमी जीवन की पूर्णाहूति सल्लेखना मरण महोत्सव के साथ किया था। उनका पूरा जीवन ही सभी के लिए शिक्षाप्रद है। उक्त उद्बोधन मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज ने आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज के 72 वां समाधि दिवस पर विनयांजि देते हुए कहा। सभा को सम्बोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि कई लोग आर्ट ऑफ लिविंग सीखाते है, पर जैन दर्शन आर्ट ऑफ लिविंग के साथ आर्ट ऑफ डाइंग भी सीखाता है। जैन श्रमण अपने संयम की रक्षा के लिए शरीर को भी छोडने को तैयार रहते हैं। आचार्य श्री शान्ति सागर जी ने छत्तीस दिन सल्लेखना की साधना की। सभी जीवों को संयम की प्रेरणा और आत्म चिन्तन करने का उपदेश दिया। मुनि श्री वैराग्यसागर जी महाराज ने विनयांजि देते हुए कहा कि वर्तमान के लोगों का पुण्य है, जो मुनि के दर्शन हो रहे है, वह सब आचार्य श्री शान्ति सागर जी महाराज की देन है। प्रत्येक श्रावकों को उनके विषय में जानना चाहिए। संयम धारण किए बिना सुख-शान्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आचार्य श्री जी ने कहिन परिस्थिति में मुनिचर्या का पालन कर सभी को संदेश दिया कि मन में यदि दृढ संकल्प कर लिया जाए, तो कोई भी कार्य असम्भव नहीं। कार्यक्रम के पूर्व आचार्य श्री शांतिसागर जी की संगीतगय पूजन की गई।




