देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। पंचम काल में अरिहन्त परमेष्ठी नहीं होने से हमें धर्म का उपदेश जिनवाणी से प्राप्त होता है। उस जिनवाणी की विनय करना, भक्ति करना प्रवचन भक्ति भावना कहलाती है। सोलहकारण भावना की महत्ता बताते हुए मुनि श्री वैराग्य सागर जी महाराज ने कहा जहाँ विज्ञान रुकता है, उससे आगे वीतराग विज्ञातु काम करता है। जैन दर्शन में जिनवाणी का भी भगवान के समान महत्त्व माना गया क्योंकि समस्त पदार्थों का ज्ञान उसमें पाया जाता है। आज का विज्ञान भी जिसकी खोज नहीं कर पाया है, उन खोजों के विषय में जैनागम में हजारों वर्षों पहले लिख दिया गया है। वेज्ञानिक जिन पदार्थों की खोज में लगे है, उसका पूर्ण विवेचन जिनेन्द्र भगवान की वाणी में पहले ही आ चूका है। विज्ञान जिनवाणी में वर्णित ज्ञान के एक अंश के बराबर भी खोज नहीं कर पाया है। सभा को उपदेश देते हुए मुनिश्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि भगवान के चरणों रखे हुए अष्ट मंगल द्रव्य भी हमें जीवन के लिए महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। मंगल द्रव्य में स्थित ध्वजा कह रही है कि जो धर्म ध्वजा को धारण करता है, वह तीन लोक की ध्वजा स्वरूप सिद्ध अवस्था को प्राप्त हो जाता है। ध्वज विजय का प्रतीक है। भगवान ने कर्मों पर विजय प्राप्त कर ली है। ध्वजा उत्साह को बढ़ाने वाली होती है। धर्मध्वजा को धारण करना पुण्य का कार्य है और यह सौभाग्य पुण्यशाली व्यक्ति को हो प्राप्त होता है। सभा के प्रारंभ में स्वेता जैन कोटा, एवं राजकुमार कोठारी ने मंगलाचरण, चित्रानावरण, दीप प्रज्वलन, शास्त्रदान, पाद प्रक्षाल श्वेता हिमांशु जनेश जैन कोटा ने किया। ट्रस्ट के शान्ति लाल जैन ने जानकारी की दशलक्षण पर्व पर आयोजित होने वाले श्रावक संस्कार शिविर में आसपास के नगर- गांव के धर्म बन्धु जन से भाग लेने का आग्रह है।




