Deolikhabarexpress

धर्म, सत्कर्म और आध्यात्मिक विद्या ज्ञान के बिना मनुष्य का जीवन बेकार है दिव्य मुरारी बापू।

देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर देवली के अटल उद्यान स्थित टीनशैड प्लेटफार्म पर चल रही 15 दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में कथा वाचन कर रहे महामंडलेश्वर 1008 श्री श्री दिव्य मुरारी बापू ने कहा कि धर्म, सत्कर्म और आध्यात्मिक विद्या ज्ञान के बिना मनुष्य का जीवन बेकार है। गुरूदेव ने बताया कि स्वामी श्री विवेकानंद जी ने कहा कि मनुष्य दूसरे जीवों से तीन विशेषता अधिक रखता है। मनुष्य दूसरे जीव जन्तुओं से धर्म में बड़ा है, कर्म में बड़ा है और ज्ञान में बड़ा है। जिस मनुष्य के जीवन में न तो कोई धर्म है, न सत्कर्म है और न तो आध्यात्मिक विद्या का ज्ञान है ऐसा व्यक्ति पृथ्वी पर विचरण करने वाले दूसरे जीवों के समान ही है। यह बात नीति में भी कही गयी है। कथा के दौरान प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं की चर्चा करते हुए कहा कि प्रभु श्री राम की लीलाओं में प्रसिद्ध बाल लीला है। जब प्रभु श्री राम बहुत छोटे थे, मां ने दूध पिलाकर उनको पालने में सुला दिया। अयोध्या के कुल देवता श्री रंगनाथ भगवान हैं, जिनकी पूजा के लिए मां ने दुबारा स्नान किया। श्री रंगनाथ भगवान का पूजन किया, कुछ नैवेद्य भोग लगाया, मां रसोई घर में देखने गई की कोई प्रसाद छूट तो नहीं गया, जो भगवान के थाल में न आया हो और वापस जब मां मंदिर में पहुंची तो देखा नन्हे से रामलला श्री रंगनाथ भगवान के विग्रह के पास विराजमान होकर प्रसाद आरोग रहे हैं। मां ने सोचा रामलला यहां कैसे आ गये। पालने में जाकर देखा तो प्रभु श्री राम सोये हुये हैं और पुनः मंदिर जाकर देखा तो प्रसाद आरोग रहे हैं। मां बहुत आश्चर्यचकित हो जाती है, तब भगवान ने मां कौशल्या को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराया। जहां भगवान के एक-एक रोम में करोड़ों करोड़ ब्रह्मांड निवास कर रहे हैं। श्री रामलला जब 4 वर्ष के हो गये तो एक बार अपने सखाओं के साथ खेल रहे थे। पिता श्रीदशरथजी महाराज उन्हें भोजन के लिये बुलाते हैं, लेकिन प्रभु नहीं आये। महारानी कौशल्या उनको ला कर महाराज दशरथ की गोंद में बैठा देती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाय तो श्रीदशरथजी ज्ञान के स्वरूप हैं और महारानी कौशल्या भक्ति स्वरूपा हैं। ईश्वर को भक्ति ही गोद में लाकर बैठा सकती है। इसलिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भगवान की भक्ति ही है। सारे साधन करके साधक को भक्ति प्राप्त करना चाहिए। प्रभु श्री राम चारों भाइयों का यज्ञोपवीत संस्कार बताया। इसके बाद प्रभु गुरुदेव वशिष्ठ के गुरुकुल में विद्या अध्ययन करने जाते हैं और थोड़े समय में समस्त विद्या प्राप्त कर लेते हैं। भगवान से ही सारी विद्या प्रकट हुई है। विद्या अध्ययन लीला जगत के शिक्षा के लिये है ताकि हर कोई शिक्षा ले सके कि जीवन में ज्ञान प्राप्त कर सके, ज्ञान प्राप्त करना अति आवश्यक है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top