संसार या संसारी का चिन्तन करने से मन बिगड़ता है:- पूज्य दिव्य मोरारी बापू।

देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। शहर के गौरवपथ स्थित नगर पालिका के टीनशेड परिसर में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ महोत्सव के दौरान महामंडलेश्वर दिव्य मुरारी बापू ने अपनी वाणी से श्रद्धालुओं को संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में भागवत महिमा का श्रवण करवाते हुए कहा कि अपने मन को प्रेम से समझाकर ऐसी ऊँची भूमिका पर पहुँचाओ कि वह सतत प्रभु-स्मरण और चिन्तन में ही रचा-पचा रहे। आपका मन किसी भी मनुष्य के स्मरण और चिन्तन में फँस न जाय,इस और हमेशा ध्यान रखो। कारण यह है कि संसार या संसारी का चिन्तन करने से मन बहुत बिगड़ता है और पाप-मार्ग में संलग्न होता है। साधक को तो अपने मन को पाप-मार्ग से लौटाना है। साधक यदि अपने मन को पाप मार्ग से लौटा सकें तो वह अपने-आप सुधरेगा और प्रभु के मार्ग से लग जायेगा।इसके लिए सबसे पहले जरूरी बात संसार को भूल जाने की है। जगत का विस्मरण होगा तो मन प्रभु-स्मरण में मग्न हो जायेगा और प्रभु के साथ प्रेम-तन्मयता प्राप्त होगी और प्रेम – तन्मयता ही जीवन की सार्थकता है। मान और प्रेम यदि दूसरों को देते रहोगे तो मन शान्त रहेगा।अपने मन को प्रेम से समझाकर ऐसी ऊँची भूमिका पर पहुँचाओ कि वह सतत प्रभु-स्मरण और चिन्तन में ही रचा-पचा रहे। आपका मन किसी भी मनुष्य के स्मरण और चिन्तन में फँस न जाय,इस और हमेशा ध्यान रखो। कारण यह है कि संसार या संसारी का चिन्तन करने से मन बहुत बिगड़ता है और पाप-मार्ग में संलग्न होता है। साधक को तो अपने मन को पाप-मार्ग से लौटाना है। साधक यदि अपने मन को पाप मार्ग से लौटा सकें तो वह अपने-आप सुधरेगा और प्रभु के मार्ग से लग जायेगा। इसके लिए सबसे पहले जरूरी बात संसार को भूल जाने की है। जगत का विस्मरण होगा तो मन प्रभु-स्मरण में मग्न हो जायेगा और प्रभु के साथ प्रेम-तन्मयता प्राप्त होगी। और प्रेम – तन्मयता ही जीवन की सार्थकता है। मान और प्रेम यदि दूसरों को देते रहोगे तो मन शान्त रहेगा। इस दौरान गोवर्धन पूजन का आनंदमय कार्यक्रम भी आयोजित हुआ। छप्पन भोग लगाया। भक्तों ने बहुत ही आनंद के साथ गोवर्धन धरण बाबा के जयघोष से पंडाल को गुंजायमान कर दिया।

 

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