देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। अन्तर्मना आचार्य 108 श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के सानिध्य में प्रातःकाल 4.30 बजे से तीन घण्टे का दीप आराधना का भव्य आयोजन हुआ उसके पश्चात मूलनायक पार्श्वनाथ, विधिनायक व आदिनाथ भगवान की प्रतिमा पर बड़े ही भक्तिभाव से अभिषेक व शांतिधारा की गई । ततपश्चात महाराज जी के मुख से आशीर्वाद स्वरूप प्रवचन हुए । बाद में सम्पूर्ण संघ की आहार चर्या हुई। अन्तर्मना परम् पूज्य आचार्य 108 श्री प्रसन्न सागर जी महाराज को आज आहार का सौभाग्य देवली नगरपालिका के पूर्व चेयरमैन नेमीचंद आंवा वालो के परिवार को मिला। समाज के मीडिया प्रभारी राजीव जैन ने बताया कि प्रवचन के दौरान कहा कि केवल किताबी ज्ञान से कोई तैरना नहीं सीख सकता उसके लिए नदी में उतरना ही पड़ता है।

वैसे ही सिर्फ पूजा-पाठ और भक्ति से स्वर्ग तो मिल सकता है लेकिन मोक्ष के लिए गुरु के आचरण को अपने जीवन में उतारना अनिवार्य है। श्रद्धा और स्वाध्याय सीढ़ियाँ हैं पर असली मंज़िल आचरण से ही तय होती है। जब तक हम धर्म को सिर्फ पढ़ेंगे और जिएंगे नहीं तब तक भवसागर पार करना मुश्किल है। गुरुदेव ने कड़वा मगर सच कहा है कि संसार में हर कोई अपने स्वार्थ के लिए जी रहा है। बेटा तब तक पिता का है जब तक उसकी शादी नहीं होती उसके बाद प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे सुंदर हमारी अपनी आत्मा ही है जिसे हम अक्सर दूसरों के मोह में भूल जाते हैं। हम जिनके लिए जी रहे हैं वे शायद हमारे लिए न जिएं इसलिए अपनी आत्मा के कल्याण पर ध्यान देना ही सबसे बड़ी समझदारी है। गुरुदेव ने भोजन और स्वास्थ्य के बीच का गहरा संबंध समझाया है। एक बार भोजन करने वाला योगी कहलाता है क्योंकि उसका पूरा ध्यान साधना पर होता है जबकि बार-बार खाने से केवल रोग और कष्ट ही हाथ आते हैं। महावीर स्वामी के समय से चली आ रही यह परंपरा आज भी साधुओं के संयमित जीवन का आधार है। असली वीरता अपनी इंद्रियों को वश में करने और आचरण में निर्मलता लाने में ही है।


