“वाह रे सिस्टम,नये नोट की गड्डी और पर्दे के पीछे का काला खेल”।

जागो ग्राहक जागो….

“बृजेश भारद्वाज,पत्रकार”

 

जिस बैंक में अपनी मेहनत की कमाई जमा करने के लिए हम लाइनों में घिसते हैं, वहीं से एक नई गड्डी के लिए भिखारी की तरह गिड़गिड़ाना पड़ता है। ईमानदारी का चश्मा उतारकर देखिए तो समझ आएगा कि बैंक अब नोटों के लेन-देन का केंद्र नहीं, बल्कि उस ‘पर्दे के पीछे वाले खेल’ का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ आपकी जरूरत को मजबूरी में तब्दील कर दिया जाता है। बैंक मैनेजर का वो रटा-रटाया जुमला कि “स्टॉक नहीं है”, बाहर खड़े दलाल के पास पहुँचते ही “कितनी गड्डियां चाहिए?” में बदल जाता है। आश्चर्य इस बात पर नहीं होती कि सिस्टम भ्रष्ट है, आश्चर्य तो इस बेशर्मी पर होती है कि ये लूट सरेआम सड़क पर टेंट लगाकर चल रही है और प्रशासन गहरी नींद का ढोंग कर रहा है। हजार रुपये के लिए पंद्रह सौ वसूलने वाले ये दलाल कोई मंगल ग्रह से नोट छापकर नहीं लाते, ये उसी ‘पिछले दरवाजे’ की उपज हैं जहाँ बैंक के कुछ सफेदपोश लोग और बिचौलिए हाथ मिला लेते हैं। आम आदमी के हिस्से की खुशियाँ और शगुन के कड़कड़ाते नोट इन काली भेड़ियों की भेंट चढ़ रहे हैं। ये साफ़ तौर पर उन ईमानदार ग्राहकों के मुँह पर तमाचा है जो आज भी नियम-कायदों की दुहाई देते हैं। असल में बैंक की तिजोरियां खाली नहीं हुई हैं, बस वहां बैठे कुछ लोगों की नीयत में दीमक लग गई है। जब तक घर की शादियों के लिए नोट बैंक के काउंटर के बजाय गली के मोड़ पर बिकते रहेंगे, तब तक समझ लीजिए कि आपका सिस्टम वेंटिलेटर पर है और उसे चलाने वाले सिर्फ अपनी जेबें गर्म करने में मशगूल हैं। क्या हम वाकई एक सभ्य समाज में रह रहे हैं या फिर उस जंगलराज में जहाँ हर सेवा की एक ‘अघोषित रिश्वत’ तय है?

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