देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर में हो रहे चतुर्मास में धर्म ज्ञान की गंगा बह रही है आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर जी महाराज के धर्म प्रभावक शिष्य मुनि श्री वैराग्य सागर जी ओर सुप्रभ सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में सिध्दचक्र महामंडल विधान चल रहा है । जिसने मुनि श्री के द्वारा समस्त सकल जैन समाज के धर्म प्रेमी बन्धुओ को उपदेश ओर पुजन के माध्यम से धर्म ज्ञान के लाभ से सरोबार कर रहे है। हम सब जानते है की जैन मुनि की चर्या त्याग, तप, संयम और आत्मकल्याण का सर्वोच्च आदर्श है। उनका प्रत्येक दिन प्रभु स्मरण, स्वाध्याय, ध्यान, सामायिक, प्रतिक्रमण, विहार और धर्मोपदेश में व्यतीत होता है। वे पंचमहाव्रतों का कठोरता से पालन करते हुए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को अपने जीवन में पूर्ण रूप से धारण करते हैं। अल्पाहार, निरंतर जागरूकता, इन्द्रिय-निग्रह, क्षमा, करुणा, समता और वैराग्य उनकी साधना के आधार हैं। जैन मुनि संसार के समस्त मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मा की शुद्धि, कर्मों की निर्जरा और मोक्ष की प्राप्ति के लिए निरंतर पुरुषार्थ करते हैं। उनका तपस्वी जीवन केवल स्वयं के आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त मानव समाज को शांति, संयम, सदाचार और अहिंसा का अमूल्य संदेश देने वाली प्रेरणादायी जीवनशैली है। ऐसी समस्त साधना का पालन करते हुए जैन संत समस्त देवली नगर को धर्ममय वातारण में ढाल रहे है और धर्ममयी वाणी से समस्त श्रावकों का उध्दार कर रहे है। 29 जुलाई गुरुपूर्णिमा के दिन मुनि संघ के वर्षायोग के मंगल कलश की स्थापना होगी जिसमें बाहर से श्रावक भी पधारेंगे जिसकी व्यवस्था में समाज के सभी पूरी श्रद्धा से लगे हुए है और कार्यक्रम भव्य बनाने की ओर अग्रसर है।




