जिसने अपने मान का हनन किया है जो अभिमान शून्य है, वही हनुमान हैः- महामंडलेश्वर दिव्य मुरारी बापू।

देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर देवली के अटल उद्यान स्थित टीनशैड प्लेटफार्म पर चल रही 15 दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में कथा वाचन कर रहे महामंडलेश्वर 1008 श्री श्री दिव्य मुरारी बापू ने कहा कि हनुमान का अर्थ है, जिसने अपने मान का हनन किया हो, जो अभियान शून्य है, वही हनुमान है। अरण्यकाण्ड में मां शबरी को माध्यम बनाकर प्रभु श्री राम नवधा भक्ति का उपदेश करते हैं। नवधा भक्ति भगवान को पाने के नौ रास्ते हैं। इसमें से कोई भक्ति अगर जीवन में बन जाये तो प्रभु की प्राप्ति हो सकती है। नवधा भक्ति की विवेचना करते हुए बताया कि प्रथम भक्ति संतों का संग, दूसरी भक्ति भगवान की कथा में प्रेम, गुरु महाराज की सेवा बिल्कुल अमान होकर तीसरी भक्ति बताया। चौथी भक्ति छल कपट का त्याग करके भगवान का गुणगान करना, पांचवी भक्ति दृढ़ विश्वास के साथ मंत्र जप। छठवीं भक्ति धीरे-धीरे संसार से मन को हटाकर भगवान में लगाना। सबमें भगवान का दर्शन करना, संतो के प्रति बहुत सम्मान का भाव रखना सातवीं भक्ति बताया। आठवीं भक्ति यथा लाभ संतोष, जो कुछ अपने परिश्रम से ईश्वर की कृपा से प्राप्त हो, उसमें संतोष रखना और किसी में दोष दर्शन न करना।और नवमी भक्ति सरल जीवन, छल कपट से रहित जीवन और भगवान पर भरोसा। किष्किन्धाकाण्ड के प्रारम्भ में प्रभु श्री राम जी का श्री हनुमान जी से मिलन होता है। महाराज सुग्रीव की प्रभु से मित्रता, बाली का उद्धार, भगवती सीता की खोज के लिए बड़े-बड़े योद्धा चारों दिशा में जाते हैं। दक्षिण दिशा में जो लोग जा रहे हैं उनमें अंगद, नल-नील जामवंत जी महाराज, श्री हनुमान जी महाराज आदि वरिष्ठ लोग हैं। सम्पाती के द्वारा यह बताया जाना कि भगवती सीता लंका अशोक वाटिका में हैं, जो सौ योजन समुद्र को पार करेगा, वही भगवती सीता का पता लगा पायेगा। उसी के द्वारा राम कार्य सम्पन्न होगा। सबने अपनी-अपनी शक्ति के विषय में बताया लेकिन समुद्र पार होने में सबने संदेह व्यक्त किया। आध्यात्मिक दृष्टि से समुद्र देहाभिमान का प्रतीक है, देहाभिमान को पार करना देहाभिमनियों से सम्भव नहीं है। हनुमान का अर्थ होता है जिसने अपने मान का हनन किया है जो अभिमान शून्य है, वही देहाभिमान को पार कर सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से सीता अर्थात् भक्ति।भक्ति को वही प्राप्त कर सकता है। इसलिए श्री हनुमान जी ही भगवती सीता का पता लगाने में सफल होते हैं। भक्ति और शांति प्राप्त करने में चार बाधाएं आती है। परिस्थितियां कैसी भी हो, मनुष्य को अपने ईष्ट देव को जरूर याद करना चाहिए। हनुमान जी जब लंका यात्रा पर जा रहे थे, तब रास्ते में लंकिनी राक्षसी ने रास्ता रोक लिया, तब हनुमान जी ने रूककर विचार किया कि मेरे से कौनसी गलती हो गई, तब याद आया कि मैंने मेरे ईष्ट राम को याद ही नहीं किया, इसलिए बाधा आई। हनुमान जी ने कहा कि आपका पुत्र इतना सामर्थ्यवान है कि वह लंका को नष्ट करके आपको ले जा सकता है, लेकिन भगवान राम आएं, उनकी जय जयकार हो और वह माता सीता को लेकर जाएं। इससे प्रसन्न होकर माता सीता ने हनुमानजी को 6 वरदान दिया। हनुमान जी ने कहा कि मैं लंका में तीन काम करके जाउंगा, कोई बलशाली हो तो रोक ले, पहला काम माता सीता को प्रणाम, अशोक वाटिका को नष्ट कर लंका को जलाकर रावण के मस्तक पर पैर रखकर वापस जाऊंगा। रामजी ने कहा कि आप लंका गये, तब हनुमानजी ने कहा कि मुद्रिका के बल पर समुद्र पार किया तथा लंका को रावण के पाप, सीता माता के संताप, विष्णु के श्राप तथा मेरे बाप पवन देवता ने जलाई। रामजी द्वारा समुद्र के जल से विभिषण का राजतिलक किया गया। तीन दिन लगातार इंतजार करने के बाद रामजी ने समुद्र को सुखाने के लिए जब धनुष उठाया तब समुद्र ने कहा कि रास्ते के लिए आपकी सेना में नल व नील नामक वानर को प्राप्त वरदान के तहत समुद्र में पत्थर तैरने लगेंगे। इस तरह समुद्र में सेतु निर्माण हुआ तथा रामजी ने लंका पर चढ़ाई की। कथा का समापन आरती व प्रसाद वितरण के साथ हुआ। सोमवार को सुबह 9:00 बजे कथा समापन के लिए आयोजित यज्ञ में श्रद्धालुओं ने पूर्णाहुति दी।

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