अपनी दुर्गति पर आंसु 😢 बहाकर भ्रष्टाचार की कीमत अदा कर रहा अटल उद्यान।

देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। शहर का अटल उद्यान मतलब “भ्रष्टाचार की दुकान”। इस उद्यान का नाम तो इस देश के ईमानदार व कर्म प्रधान नेता अटल बिहारी वाजपेई जी के नाम से रखा गया। किंतु इस गार्डन की कहानी काले कारनामो की दास्तान बन कर रह गई है। हालांकि इस गार्डन के घोंटालो की कहानियों की लिस्ट बहुत लंबी है। मगर कुछ मुख्य बिंदुओं की ओर जनता का ध्यान आकर्षित करना चाह रहा हु। में यहाँ जनता के ध्यान में ही डालने की बात इसलिए लिख रहा हु क्योंकि पालिका ने तो सारे कर्मकांड खुद किये ही है तो उनका ध्यान आकर्षित करना मतलब अपने ही सिर पर नारियल फोड़ने जैसा है। खेर इस उद्यान की विडम्बना ही है की करोड़ों रुपयों कि लागत खर्च के बाद भी टॉय ट्रेन खराब पड़ी है वही महज दिखावे के लिए खड़ी हुई है।

शहर के बच्चो ने बड़े अरमान सजाए थे ट्रेन में बैठने के मगर कुछ दिन बाद ही अरमानों पर पानी फिर गया। और ये ट्रेन केवल कबाड़ा बनकर रह गई। हालांकि इस टॉय ट्रेन ने ठेकेदार व दलालों को जरूर मालामाल कर दिया। गार्डन में लगे म्यूजिकल फाउंटेन खराब पड़े है जिन पर लाखों रुपये खर्च हुए थे मगर ये भी केवल श्यो पीस बनकर रह गए। इधर भ्रमण ट्रेक की सभी लाइट्स टूटी पड़ी है जिनको देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है। उधर शौचालय की सुध लेने वाला कोई नही है टोटियां उखड़ी हुई है ना साबुन ना पानी गंदगी कह रही है इनके लालच की कहानी। गार्डन में जिम करने के सामान खत्म हालत में है साथ ही सीसीटीवी कैमरे अधिकांश बंद पड़े है। बरसात के जल की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। गार्डन को महज दिखावे के लिए दो-तीन घंटे सुबह व दो-तीन घंटे शाम को खोलकर खाना पूर्ति की जाती है। बुजुर्ग और उम्र दराज एवं आस पास के ग्रामीण सर्दी के मौसम के चलते धूप सेंकने पार्क में जाने के लिए तरसते हैं।

उद्यान के सम्पूर्ण गेटों पर महज एक काम चलाऊ सस्ता चौकीदार रखा है जो की थोड़ा थोड़ा सा गेट खोल कर दूर बैठा रहता है ठेकेदार की मौज हो रही है। कई बार तो इनके सामने ही गार्डन में पशु विचरण करते रहते है कोई कहने सुनने वाला नहीं है अपनी दुर्दशा और भ्रष्टाचार पर रो रहा है अटल उद्यान। हाँ प्रेमी युगल जोड़ो के लिए जरूर ये पार्क किफायती साबित हो रहा है जिनको चौकीदार महोदय द्वारा छूट दी हुई है कि सबके सामने अश्लीलता फैलाये कोई रोकने टोकने वाला नही है। सभ्य लोगो को ऐसा माहौल देखकर नज़रे झुकानी पड़ती है। मगर करे तो कोई क्या करे जब सब कुछ जानते हुए राजा ही धृतराष्ट्र बनकर बैठ जाये।

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