अक्षय तृतीया पर्व त्याग, तपस्या और दान-पुण्य के ‘अक्षय’ (कभी न खत्म होने वाले) फल का प्रतीक है। – विज्ञा श्री माताजी*

देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में अक्षय तृतीय पर्व गुरु मां 105 विज्ञा श्री माताजी के सान्निध्य में बड़ी धूमधाम से मनाया गया। कार्यक्रम की जानकारी देते हुए अध्यक्ष संजय जैन, मंत्री शांति लाल सोनी , प्रवक्ता अंकित जैन डाबर ने बताया कि इस अवसर पर माताजी जी ने जैन धर्म में अक्षय तृतीया पर्व का महत्व दान दिवस के रूप में बताया ओर कहा जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने एक वर्ष तक निर्जल-निराहार तपस्या की थी। वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन उनका उपवास, राजा श्रेयांस द्वारा गन्ने के रस के आहार दान से टूटा था। जैन परंपरा में इस दिन विशेष रूप से आहार दान, ज्ञान दान, और औषधि दान का विधान है। इसे अक्षय पुण्य (अमर पुण्य) अर्जित करने का दिन माना जाता है। सुबह ही माता जी के सान्निध्य में अभिषेक शांति धारा सम्पन्न हुई। इसके बाद धर्मसभा का आयोजन हुआ जिसमें चित्र अनावरण का नन्द लाल जी जैन डाबर वालो,माताजी के पास प्रक्षालन महावीर अजमेरा सांडला, शास्त्र भेट तेजमल पाटनी लुहारी वाले ने प्राप्त किया। इस अवसर पर समाज के सभी महिला और पुरुषों ने माताजी का आहार हेतु पड़गहांन भी किया। इसके बाद सभी को गन्ने के रस (इक्षु रस) का वितरण भी किया गया।

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