मानव जीवन के कल्याण के अनेक साधनों में भक्ति ही सर्वोपरि हैः- दिव्य मुरारी बापू

देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर देवली के अटल उद्यान स्थित टीनशैड प्लेटफार्म पर चल रही 15 दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में कथा वाचन कर रहे महामंडलेश्वर 1008 श्री श्री दिव्य मुरारी बापू ने कहा कि रामायण में शिव चरित्र का विशेष महत्व है। शिव चरित्र से जीवन जीने की कला सीखने को मिलती है, जिस व्यक्ति ने जीवन जीने की कला सीख ली है, वह जहां भी रहेगा, वहीं पर सुखी रहेगा। उन्होंने कहा कि महाभारत में दुर्योधन ने हमेशा पांडवों का बुरा चाहा, लेकिन युधिष्ठिर ने कभी भी दुर्योधन का बुरा नहीं चाहा, इसलिए युधिष्ठिर को अजातशत्रु कहा गया है। रामायण में संत के पांच लक्षणों का वर्णन किया गया है। संतों की महिमा बताते हुए कहा कि भगवान की पूजा के साथ साथ संतों की सेवा नहीं करने पर पूजा अधूरी मानी जाती है, लेकिन संतों की पूजा करने पर संत के मन में बैठे भगवान की भी पूजा हो जाती है। जैसे गर्भ के बालक को खुश रखने के लिए गर्भवती महिला की सेवा करना बताया है। भगवान शिव अपने मंगलमय चरित्र से पूरे संसार को भक्ति की शिक्षा देते हैं। कल्याण के अनेक साधन है जिसमें भक्ति सर्वोपरि है। भक्ति चिंतामणि है, जिसके घर में बस जाती है, उनके यहां सदैव प्रकाश ही प्रकाश रहता है। मोह रूपी दरिद्रता मिट जाती है। अज्ञान का अंधेरा सदा के लिये समाप्त हो जाता है। मदादि पतंगे इससे हार जाते हैं। काम आदि चोर, चोरी करने के लिये पास नहीं आ सकते। भक्ति मणि के प्रभाव से विष भी अमृत के समान हो जाता है। जीवन का दर्शन ही बदल जाता है। भक्त अभय हो जाता है। यदि जीव को भक्ति मणि मिल जाये तो अज्ञान की गांठ छूट जायेगी और जीवन कृत-कृत्य हो जायेगा। जहां भेद है, वहीं भय दिखाई देता है। जब सबके भीतर प्रभु बैठे हैं, तो डर किसका? बैर किसके साथ? इस दौरान कथा के बीच किए गए कीर्तन पर महिलाओं ने नृत्य किया। कथा का समापन आरती व प्रसाद वितरण के साथ हुआ।

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