प्रतिकूलता में ही कर्मों की निर्जरा होती है अनुकूलता में नहीं:- मुनि वैराग्य सागर।

देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। मुनि वैराग्य सागर जी ने
छठ आवश्यक कार्य में पूजा को लेकर समझाया सबसे पहले मंगलाष्टक करना चाहिए, फिर जल शुद्धि हेतु मंत्रों द्वारा जल धारा छोड़ते क्षीरसागर की स्थापना करते हुए जल को और अधिक पवित्र करना है। क्षीरसागर के जल में विकलतराय जीव नहीं पाए जाते इसलिए छानने की आवश्यकता नहीं होती। अभिषेक के लिया लाया गया जल बड़ी सावधानी से कार्य में लाना चाहिए नहीं तो इससे कर्मों की निर्जरा नहीं हो पाती है। मुनि वैराग्य सागर जी महाराज ने गुंसी में विज्ञा श्री माताजी के सानिध्य में 23 अगस्त को होने वाली जैनेश्वरी दीक्षा हेतु देवली आई दिक्षार्थी दीदीया को संबोधित करते हुए कहा – राग द्वेष का त्याग स्वजन परजन का त्याग करना अंतर कषायों को त्याग करना से ही दीक्षा सार्थक है प्रतिकूला में ही निर्जरा होती है अनुकूलता में नहीं होती है। आहार सामयिक प्रवचन के पहले मोन हो जाना चाहिए। आचार्यों ने कहा है धर्म प्रभावना के लिए दीक्षा न ले सको तो दीक्षार्थियों की गोद भराई करे। दीक्षार्थियों की अनुमोदना करें एवं भावना भाये की अंत समय में समाधि मरण हो। अंत में समाज के लोगो द्वारा दीक्षार्थी दीदी की गोद भराई की गई। एवं इनके पुण्य की अनुमोदना की गई।

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