देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। मुनिश्री प्रणीत सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में श्रावकों को धर्म के वास्तविक मर्म से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि सिद्धत्व की प्राप्ति तक हर जीव आध्यात्मिक रूप से ‘गर्भवती’ है, क्योंकि वह निरंतर कर्मों को जन्म दे रहा है। मुनिश्री ने वर्तमान पूजन पद्धति को मात्र ‘जल स्थानांतरण’ बताते हुए भावों की शून्यता पर चिंता व्यक्त की। संयोजक पंकज जैन व दिनेश जैन ने बताया कि उन्होंने माताओं को मरुदेवी जैसा पावन चिंतन अपनाने की प्रेरणा दी, ताकि समाज को संस्कारित संतानें मिल सकें। महाराज जी ने स्पष्ट किया कि जब तक खान-पान में शुद्धि और इंद्रियों पर संयम नहीं होगा, तब तक वीतरागता का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। इस प्रवचन का मुख्य संदेश बाहरी प्रदर्शन को छोड़कर तत्व निर्णय और भेद-विज्ञान द्वारा आत्म-कल्याण करना रहा।





