देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। आज के समय मे परीक्षाओं के परिणाम इतने तेज कि घड़ी भी शर्मा जाए… और अंक इतने ज्यादा कि मेधावी भी सोच में पड़ जाए! शिक्षा व्यवस्था में इन दिनों “नंबरों की सुनामी” ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—क्या वाकई प्रतिभा बढ़ी है या फिर अंकों का बाजार सज गया है? बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम इस बार रॉकेट की स्पीड से जारी हुए। छात्रों ने भी ऐसा कमाल दिखाया कि 95% अब सामान्य और 99% “लगभग ठीक-ठाक” माना जाने लगा है। हालत यह है कि मोहल्ले का हर दूसरा बच्चा टॉपर घोषित हो रहा है और *असली टॉपर खुद अपनी पहचान ढूंढता फिर रहा है।* शिक्षाविदों की मानें तो इतने अधिक अंक और इतनी जल्दी परिणाम जारी होना कहीं न कहीं मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। *कॉपियां जांची जा रही हैं या सिर्फ नंबर बांटे जा रहे हैं—यह बहस अब आम हो चली है।* अब वो दौर आ गया है जब 100 में 100 लाना भी “अच्छा प्रयास” माना जाएगा और 98 लाने वाला बच्चा घर में सफाई देने को मजबूर होगा—“मम्मी, बस दो नंबर ही तो कटे हैं!” वहीं दूसरी ओर, असली प्रतिभाएं जो गहराई से समझती हैं, वे इस नंबरों की भीड़ में कहीं खोती नजर आ रही हैं। यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में डिग्रियां तो सबके पास होंगी, लेकिन असली हुनर और काबिलियत खोजने के लिए शायद अलग से “प्रतिभा खोज अभियान” चलाना पड़ेगा। 99% वाला टॉपर किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में कट ऑफ नंबर लाकर सिलेक्ट भी नहीं हो पाता!!! इन नंबरों की वैल्यू क्या है???? कहीं एडमिशन नहीं होता!!!!
अब सवाल यही है—क्या हम शिक्षा को बेहतर बना रहे हैं या सिर्फ अंकों का महोत्सव मना रहे हैं?
यह एक सोची समझी चाल है सरकारी स्कूल में पढ़ा लिखा कंपीटिशन फाइट कर टीचर ,व्याख्याता बनता है ओर प्राइवेट स्कूलों में बेरोजगार युवक युवतियों की भर्ती 8,10 हज़ार रुपए प्रति माह ओर नंबर 99,80 वहा रहे प्राइवेट स्कूल संचालकों बच्चों को किसी काबिल मत छोड़ना अपनी दुकान चलाने के लिए।






