सरपंच घोटाला कैसे करता है, गाँव के अंदर मनरेगा में सबसे बड़ा खेल कैसे होता है!

{पत्रकार बृजेश भारद्वाज, देवली}….

आप सोच भी नहीं सकते हो कि सरपंच घोटाला कैसे करता है, गाँव के अंदर मनरेगा में सबसे बड़ा खेल कैसे होता है? तो सरपंच के घोटालों में सबसे पहला जो घोटाला आता है वो आता है मनरेगा घोटाला। अब मनरेगा घोटाला कैसे किया जाता है, इसे बिलकुल आसान भाषा में समझिए। गाँव के अंदर जो मनरेगा का काम होता है वो पंचायत के माध्यम से चलता है, जो मनरेगा के अंदर हाजिरी लगाता है, जो रिकॉर्ड संभालता है और जो मनरेगा का secretary होता है ये लोग पूरे system के अंदर जुड़े होते हैं। अब सबसे पहला काम किया जाता है कि अपने परिवार वालों के जॉब कार्ड बनवाए जाते हैं या फिर दोस्त सगे संबंधी और खास लोगों के जॉब कार्ड इकट्ठे किए जाते हैं, ऐसा करके मान लीजिए पचास जॉब कार्ड इकट्ठे कर लिए गए और एक जॉब कार्ड में दो-दो नाम हैं, यानी कुल सौ लोगों का रिकॉर्ड तैयार हो गया, अब इन लोगों में से किसी एक आदमी को चुना जाता है जो मनरेगा में हाजिरी लगाने का काम करेगा, फिर जैसे ही गाँव में कहीं मनरेगा का काम शुरू होता है, जैसे तालाब खुद रहा है, सड़क बन रही है या नाली का काम चल रहा है। तो वहाँ जो असली मजदूर काम कर रहे होते हैं उनकी हाजिरी तो लगती ही है, लेकिन उनके साथ-साथ उन लोगों की भी हाजिरी लगनी शुरू हो जाती है जो घर पर बैठे होते हैं और यही असली खेल शुरू होता है। सरकार की तरफ से मजदूरी का पैसा सीधे खातों में आता है, तो जिन लोगों ने बिना काम किए सिर्फ नाम चलवाया होता है उनके खातों में भी पैसे आने लगते हैं। फिर जो पैसे खाते में आता है उसमें से कुछ पैसा वो आदमी खुद रख लेता है और बाकी पैसा निकालकर सरपंच हाजिरी लगाने वाले या सिस्टम से जुड़े लोगों को दे दिया जाता है, अब जरा हिसाब समझिए। अगर एक आदमी की दिहाड़ी दो सौ पचास रुपए है और सौ लोगों के नाम पर पैसा निकाला जा रहा है, तो एक दिन का पैसा बनता है पच्चीस हजार रुपए और ये पैसा सिर्फ एक दिन का नहीं आता। कई बार पाँच-छह दिन का पैसा एक साथ आता है, यानी लगभग डेढ़ लाख रुपए तक का भुगतान होता है। अब अगर उसका आधा हिस्सा भी वापस लिया जाए, तो सोचिए कितना बड़ा खेल होता होगा। और एक बहुत जरूरी बात कि कई बार ऐसा भी होता है कि सरपंच को पूरी जानकारी भी नहीं होती है। और हाजिरी लगाने वाला आदमी और मंत्री का secretary मिलकर ही पूरा खेल कर देते हैं। लेकिन अगर ऊपर से सहमति मिल जाए तो फिर घोटाले का level और बड़ा हो जाता है। कागजों में पूरा काम दिखा दिया जाता है लेकिन जमीन पर सड़क अधूरी रहती है, तालाब अधूरा रहता है और गाँव वहीं का वहीं रह जाता है। यही वजह है कि कई गाँव में करोड़ों रुपए खर्च दिखते हैं लेकिन विकास कुछ भी नहीं दिखाई देता।

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