पद के लालच में ही मनुष्य भूतपूर्व बनता है, भक्त और भगवान कभी भूतपूर्व नहीं होतेः- दिव्य मुरारी बापू

देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर देवली के अटल उद्यान स्थित टीनशैड प्लेटफार्म पर चल रही 15 दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में कथा वाचन कर रहे महामंडलेश्वर 1008 श्री श्री दिव्य मुरारी बापू ने कहा कि मनुष्य को हमेशा पद की लालसा बनी रहती है और पदासीन होने के बाद पदच्युत होते ही वह भूतपूर्व बन जाता है। भक्त और भगवान कभी भी कोई पद नहीं लेते हैं इसलिए भक्त और भगवान को कभी भूतपूर्व नहीं बनना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एक हजार चतुर्युगी का एक कल्प होता है, इसमें किसी न किसी त्रेता में प्रभु श्री राम का अवतार होता है। श्रीरामचरितमानस में चार कल्पों की कथा है। एक कल्प में अपने द्वारपाल जय-विजय के उद्धार के लिए भगवान अवतार लेते हैं। रमा बैकुण्ठ की बात है,सनकादिक भगवान का दर्शन करने जा रहे थे, जय-विजय ने उन्हें रोका, श्राप दे दिया। सनकादिकों के शाप से जय विजय रावण कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लिये, उनके उद्धार के लिए भगवान ने अवतार लिया। एक कल्प में सती वृन्दा के शाप से भगवान का अवतार हुआ और वहां जालन्धर रावण बना है। एक कल्प में नारद मोह का प्रसंग सुनाया है। देवर्षि नारद के शाप से भगवान का अवतार हुआ और उस कल्प में नारद मोह के समय दो शिव गणों ने उनकी बहुत हंसी उड़ाई थी। नारद जी के शाप से वही रावण कुम्भकर्ण बने। इस कथा से शिक्षा मिलती है कि हम भले ही कितने बड़े हो लेकिन किसी की हंसी नहीं उड़ाना चाहिए, किसी के दिन अच्छे नहीं है तो उसे सम्हालना चाहिए। दूसरे की खराब परिस्थितियों पर हंसी उड़ाने वाला अच्छा नहीं होता। श्री मनु शतरूपा ने नैमिषारण्य में तप किया, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्री सीताराम जी प्रकट हुये। मनु महाराज ने भगवान जैसा पुत्र मांगा, प्रभु श्री राम ने कहा मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है। मैं स्वयं आपका पुत्र बनूंगा। वही मनु महाराज त्रेता में श्री दशरथ कौशल्या के रूप में जन्म लेते हैं और भगवान उनके यहां श्रीराम रूप में अवतार लेते हैं। इस कल्प में प्रताप भानु नाम का राजा ब्राह्मणों के श्राप से रावण बना और भगवान की लीला हुई। त्रेता के चतुर्थ चरण में महाराज दशरथ के महल में प्रभु श्री राम का अवतार होता है। मनुष्य के ह्रदय में जिस देवता का भाव रहता है, भगवान भी उस भक्त को उसी रूप में दर्शन देते हैं। मंदिर में भगवान सगुण विराजमान रहते हैं, मनुष्य को मंदिर में हमेशा आंख खुली रहनी चाहिए। मंदिर के बाहर भगवान निर्गुण भाव से रहते हैं। भगवान शंकर रामायण में कहते हैं कि जिस तरह पानी का कोई रुप नहीं होता है, वैसे ही भगवान का कोई स्वरूप नहीं होता है। पानी को जिस पात्र में रखा जाएगा, वह वैसा ही रूप बना लेगा, वैसे ही भगवान भी भक्त के भाव के अनुसार सगुण साकार रूप में प्रकट होंगे। भगवान संसार में अवतार लेकर भक्तों के लिए आते हैं, लेकिन जब संसार में आ ही जाते हैं तो राक्षसों का भी संहार करते हैं। वैसे तो भगवान स्वर्ग में बैठे बैठे ही राक्षसों का संहार कर सकते हैं, लेकिन सबरी, केवट तथा अहिल्या का उद्धार करने के लिए धरती पर अवतरित होना पडता है। हम सबको पद का मोह बना रहता है, इसलिए हमारे नाम के पहले भूतपूर्व की उपाधि लग जाती है। लेकिन हमारे भगवान व भक्त कोई पद नहीं लेते, इसलिए भगवान और भक्त के नाम के पहले कभी भी भूतपूर्व नहीं लगता। भगवान बिना कान के ही सुन लेते हैं। महात्मा लोग कहते हैं, हमें भौतिक सुविधाओं का कुछ शुल्क देना पड़ता है, लेकिन भगवान अपनी सुविधाओं का कोई शुल्क नहीं लेते, जैसे बिजली का बिल चुकाना पड़ता है, लेकिन सूर्य अपनी रोशनी का कोई शुल्क नहीं लेते। कथा के दौरान महिलाओं ने भाव विभोर होकर नृत्य किया। कथा का समापन आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *