देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर देवली के अटल उद्यान स्थित टीनशैड प्लेटफार्म पर चल रही 15 दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में कथा वाचन कर रहे महामंडलेश्वर 1008 श्री श्री दिव्य मुरारी बापू ने सफलता के 4 सूत्र बताते हुए कहा कि मनुष्य को ईश्वर में विश्वास रखना चाहिए, हमेशा प्रत्येक जीव के साथ सद्भावना, किसी भी कार्य से घबराना नहीं चाहिए, धैर्य रखना चाहिए एवं माता पिता व गुरु का आशीर्वाद भी होना चाहिए। कथा के दौरान भगवान श्री सीताराम जी के विवाह में प्रधान रूप से पांच प्रसंग बताये गये हैं। नगर दर्शन लीला, पुष्प वाटिका, धनुष यज्ञ, परशुराम संवाद और श्री सीताराम विवाह। नगर दर्शन लीला में प्रभु श्री राम लक्ष्मण जनकपुर देखने के लिए जाते हैं। श्री लक्ष्मण जी के मन में जनकपुर देखने की इच्छा जागृत हुई, भगवान उनके हृदय के भाव को समझकर गुरु जी से अनुमति मांगते हैं और सदगुरुदेव श्री विश्वामित्र जी ने अनुमति दे दिया। नगर दर्शन लीला में सबको भगवान का दर्शन हुआ। आध्यात्मिक दृष्टि से जीव संसार रूपी नगर को देखने आया है। अगर जीव अपने साथ परमात्मा को रखेगा तो संसार रूपी नगर में कहीं भी उसे कोई रुकावट नहीं आयेगी। भगवान को साथ रखने का आध्यात्मिक अर्थ है, सदैव भगवान का स्मरण रखना। भगवान का स्मरण करते हुए संसार के कार्य करेंगे, तो संसार का कार्य भी हो जायेगा और भगवान का भजन और जीवन सफल होगा। पुष्प वाटिका प्रसंग में भगवान श्री सीताराम जी का मिलन बताया है। गुरु जी की सेवा-पूजा के लिए पुष्प लेने श्री राम लक्ष्मण पुष्प वाटिका पधारते हैं और गिरजा भवानी की पूजा के लिए मां की आज्ञा से सखियों के साथ भगवती सीता पहुंचती हैं। जहां श्री सीताराम जी का लीला में प्रथम मिलन होता है। अगर दुनियां का हर कुमार गुरु की सेवा में रहे और दुनियां की हर कन्या मां भगवती की आराधना करे तो संसार में कोई दुःखी नहीं रहेगा। धनुष यज्ञ प्रसंग में पूरी धरती के राजा पधारे थे लेकिन किसी से धनुष नहीं हिला। सभी राजा इकट्ठा होकर भी बल लगा लिए लेकिन धनुष नहीं हिला। गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान श्री राम ने धनुष भंग किया। इस प्रसंग में पूज्य गोस्वामी जी ने सफलता के चार सूत्र बताइये। आप किसी भी क्षेत्र में सफल होना चाहते हैं तो पहली बात है ईष्ट निष्ठा। दूसरा सद्भावना। तीसरा – कार्य कितना ही बड़ा हो लेकिन घबराना नहीं, सफलता का सूत्र है धैर्य और चौथा सूत्र है माता-पिता गुरुजनों की कृपा। जिसके ऊपर बहुत लोगों का आशीर्वाद होता है उसके लिए कोई भी काम कठिन नहीं है। श्रीमद्भगवत गीता के तत्व को परशुराम संवाद में बताया गया है। गीता जी में भगवान कहते हैं, हर व्यक्ति को स्वधर्म पालन करना चाहिए। अगर कल्याण के लिए दो सूत्र कहा जाएं तो एक ईश्वर की आराधना और दूसरा स्वधर्म पालन। श्री सीताराम विवाह में चारों भाइयों का विवाह एक ही मण्डप में हुआ। पूज्य गोस्वामी जी विवाह प्रसंग में जीव ब्रह्म को प्राप्त कर सके, हम आप भगवान को पावैं, इसके लिए सूत्र बताए। पहली बात मन की चंचलता को ईश्वर को सौंप देना, जहां भी मन जाए वहां ईश्वर का चिन्तन करना। दूसरा शत प्रतिशत भगवान की शरणागति स्वीकार करे। तीसरी कृपा गुरुदेव करते हैं। गुरुदेव वशिष्ठ ने सीताराम जी का गठबंधन किया और विवाह कराया। गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज भगवान के विवाह की कथा श्रवण करने की फलश्रुति कहते हैं- जो भगवान की कथा प्रेम पूर्वक कहेंगे, सुनेंगे, उत्सव मनाएंगे, भगवान उसके जीवन को उत्सव बना देंगे। श्री राम जानकी सहित चारों भाइयों के विवाह की सजीव झांकी सजाई गई तथा विवाह महोत्सव मनाया गया। विवाह महोत्सव में श्रद्धालुओं ने उल्लासपूर्वक भाग लिया तथा जमकर ठुमके लगाए। कथा का समापन आरती व प्रसाद वितरण के साथ हुआ।







