देवली:-(बृजेश भारद्वाज)। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर देवली के अटल उद्यान स्थित टीनशैड प्लेटफार्म पर चल रही 15 दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में कथा वाचन कर रहे महामंडलेश्वर 1008 श्री श्री दिव्य मुरारी बापू ने कहा कि जिस श्राप से भगवान के दर्शन हो जाए वह श्राप नहीं आशीर्वाद होता है। इसकी विवेचना करते हुए महाराज श्री ने बताया कि अयोध्या से जनकपुरी के रास्ते में जब भगवान ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार किया तो अहिल्या ने अपने पति की कोई भी गलती नहीं बताते हुए कहा कि उन्होंने मुझे पत्थर की शिला में परिवर्तित होने का श्राप नहीं, आशीर्वाद दिया था। अगर वह आशीर्वाद नहीं देते तो आज मुझे राम के दर्शन कैसे होते। लोगों को करोड़ों वर्ष तक तपस्या करने के बाद फिर राम के दर्शन का लाभ नहीं मिलता, मुझे तो एक पति के आशीर्वाद की बदौलत की राम के दर्शन मिले हैं, जबकि राम ने कहा कि मैं क्षमा याचना करता हूं। मुझे आने में बहुत देर हो गई, इसलिए आपको सर्दी, गर्मी धूप एवं बरसात के साथ साथ लोगों के ताने सहने के लिए यहां शीला रूप में खड़ा रहना पड़ा। इससे पूर्व भगवान राम ने ताड़का का वध किया तथा लक्ष्मण ने जंगल के समस्त राक्षसों का वध कर विश्वामित्र के आश्रम की रक्षा की। इससे प्रसन्न होकर मुनि विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को बला और अतिबला नामक विद्याएं प्रदान की, जिससे राम और लक्ष्मण को भूख, प्यास और थकान महसूस नहीं होती है। इसके बाद सिद्धाश्रम पहुंचकर राम और लक्ष्मण ने मरीच और सुबाहु जैसे राक्षसों का वध कर उद्धार किया। गुरुदेव ने कहा कि अविद्या ही मनुष्य को असुर बना देती है। लक्ष्मण जी ने पूरी राक्षस सेना को ही समाप्त कर दिया। तत्पश्चात भगवान ने जनकपुर की यात्रा शुरू की। रास्ते में एक जंगल मिल, जहां पर एक पत्थर की मूर्ति के रूप में गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार किया। अहिल्या की गलती नहीं होने के बावजूद भी वह दंड भोगती रही लेकिन किसी के सामने नहीं रोई, सिर्फ भगवान राम के सामने ही अश्रु धारा बहने लगी। भगवान के सामने रोने वाले व्यक्ति को किसी के सामने नहीं रोना पड़ता।






